आंदोलन का राजनीतिकरण, भ्रष्ट भर्ती व्यवस्था के बीच झारखंड के छात्रों की लड़ाई: आखिर कब सुधरेगी परीक्षा व्यवस्था?

झारखंड के देवघर के रहने वाले गौतम कुमार पिछले छह वर्षों से पटना में रहकर सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं। गौतम झारखंड, बिहार और केंद्र सरकार की ओर से निकलने वाली विभिन्न सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करते हैं।

गौतम बताते हैं, “मेरे पापा देवघर में किराने की छोटी-सी दुकान चलाते हैं। पटना में रहने के लिए वे मुझे हर महीने 6,000 रुपए देते हैं। इसी रकम में कमरे का किराया, खाने-पीने और पढ़ाई का खर्च निकालना पड़ता है। परीक्षा, पेपर लीक, सीटों की बिक्री, परीक्षा रद्द होना और फिर कोर्ट का चक्कर—इन्हीं पांच चीजों के बीच हमारे जीवन की पूरी उम्मीद घूम रही है। छात्र आंदोलन में शामिल होने के लिए मैं झारखंड भी गया था, लेकिन पिता के कहने पर वापस पटना लौट आया हूं।”

गौतम की तरह देश के अलग-अलग राज्यों के हजारों छात्रों की कहानी लगभग एक जैसी है। सरकारी नौकरी की उम्मीद लेकर वर्षों से तैयारी कर रहे इन युवाओं के सामने जब बार-बार परीक्षाओं से जुड़ी अनिश्चितताएं और विवाद खड़े होते हैं, तो उनका धैर्य जवाब देने लगता है। यही बेचैनी कभी दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिखाई दी थी और अब झारखंड में छात्र आंदोलन के रूप में एक नई कहानी लिख रही है।

झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहा छात्र आंदोलन सोमवार यानी 10 अगस्त को 17वें दिन में प्रवेश कर गया। इस दिन झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों ने दिनभर आंदोलन किया। छात्र प्रदर्शन करते हुए विधानसभा के गेट नंबर एक तक पहुंच गए। इसके बाद वहां धरने पर बैठ गए। शाम को हुए लाठीचार्ज के बाद अनशन कर रहे देवेंद्र महतो की तबीयत खराब हो गई। पुलिस प्रदर्शन स्थल से उनको एंबुलेंस में लेकर गई। 

छात्र मुद्दा बन रहा राजनीतिक मुद्दा

कल भाजपा ने झारखंड बंद का आह्वान किया है। वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों पर बल प्रयोग को गलत बताते हुए राज्य सरकार से उनकी बात सुनने और बातचीत के जरिए समस्या का समाधान निकालने की अपील की। 

सत्ता पक्ष के कई नेता आरोप लगाते हैं कि इस आंदोलन के पीछे भाजपा का हाथ है। पॉलिटिकल एक्टिविस्ट ब्रह्मदेव पासवान बताते हैं कि, “बीजेपी झारखंड के युवाओं के भविष्य के लिए आवाज़ उठाने के बजाय माहौल बिगाड़ना चाहती है। जिन्हें आंदोलन के मुद्दे तक का पता नहीं, उन्हें छात्रों की भीड़ में शामिल कर रांची की माहौल को खराब करने की कोशिश की जा रही है।”

राजनीतिक मुद्दे पर लिखने वाले साकिब कहते हैं कि,”झारखंड में छात्र आंदोलन के पहले दिन से मुख्यमंत्री और राज्य सरकार आंदोलनकारियों से लगातार बातचीत कर समाधान निकालने की कोशिश कर रही है। सरकार ने आंदोलनकारियों की अधिकांश मांगें मान ली है। मांग के अनुसार तीन परीक्षाएं रद्द की गई है, जिसमें जेपीएससी सिविल सर्विस परीक्षा का प्रीलिम्स भी शामिल है। जेपीएससी के तीन सदस्यों का इस्तीफा लिया गया है। जेपीएससी चेयरमैन, जिनका इस्तीफा आंदोलन शुरू होने के समय ही 22 जुलाई को ले लिया गया था, समेत 20 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।” 

“सिर्फ दो मांगें नहीं मानी गई हैं, जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द करना और पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराना। आंदोलनकारी इन दोनों मांगों पर समझौते को तैयार नहीं हैं। साकिब के मुताबिक, सरकार का विकल्प ज्यादा बेहतर है। इसके बावजूद विधानसभा मार्च जारी रखा गया। सरकार की ओर से लगभग नगण्य बल प्रयोग किया गया और आंदोलनकारियों को विधानसभा कैंपस तक जाने दिया गया।

मुख्यमंत्री अब भी कह रहे हैं कि किसी अन्य मुद्दे पर चर्चा करनी हो तो सरकार तैयार है। इससे ज़्यादा क्या कर सकती है कोई सरकार? मुख्यमंत्री छत पर चढ़कर कूद जाए तब माना जाएगा कि सरकार संवेदनशील है?” आगे साकिब बताते है।

वहीं झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार विष्णु राजगढ़िया लिखते हैं कि,” जंतर मंतर से झारखंड अलग है, यह दिखाने की बचकानी कोशिश भी एक बाधा है। इस नरेटिव को गोदी मीडिया ने फैलाया, जिसका मकसद सीजेपी को बदनाम करना था। जबकि असल कारण है कि झारखंड में किसी ने आंदोलन को देशद्रोह नहीं कहा, इसलिए यहां गालियों के रूप में आक्रोश की नौबत नहीं आई। लेकिन शायद इसी महान मुद्रा में सरकार आ गई हो, सोचा हो कि दिल्ली में लाठी गोली चली, हम नहीं चलाकर फर्क दिखा देंगे।

इसके कारण यहां तक नौबत आई। आंदोलन को इतने दिन चलने देना सरकार की विफलता है। काफी पहले ठोस वार्ता करके रास्ते निकालना संभव था। तब बाहरी हस्तक्षेप भी इतना नहीं बढ़ता। अब भी ठोस निर्णय जितनी जल्द ले सकें, यही बुद्धिमानी है।’

गौरतलब है कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच रविवार यानी 9 अगस्त को रांची स्थित स्टेट गेस्ट हाउस में छठे दौर की बातचीत हुई। सूत्रों के मुताबिक बैठक में 14वीं जेपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा रद्द करने और मामले की उच्चस्तरीय जांच के लिए कमेटी गठित करने की मांग पर सहमति बनी। साथ ही, सरकार जेपीएससी परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसी टीडीपीएल के आर्थिक लेन-देन की जांच ईडी से कराने के लिए भी तैयार हो गई। टीडीपीएल से जुड़े आर्थिक अपराधों के प्रमाण मिले हैं।

इधर, रांची में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के बीच झारखंड लोक सेवा आयोग के तीन सदस्य अजीता भट्टाचार्य, अनिमा हांसदा और जमाल अहमद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने राज्य सरकार की सिफारिश पर तीनों सदस्यों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए हैं।

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है और आंदोलन शुरू होने तक हेमंत सोरेन सरकार इससे अनजान बनी रही। इस लिहाज से छात्रों का आंदोलन जायज था। आंदोलन शुरू होने के बाद सरकार ने कार्रवाई की और छात्रों से बातचीत का रास्ता भी खुला रखा।

कौन है जेपीएससी परीक्षा में धांधली का मास्टर माइंड अभय तिवारी?

जेपीएससी परीक्षा में अनियमितता को लेकर सीआईडी की कार्रवाई लगातार जारी है। सीआईडी ने जिन पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। उसमें जो अभय तिवारी नाम का जो शख्स है, यही असली मास्टरमाइंड है। गौरतलब है कि जेपीएससी की उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता, टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक रामवीर सिंह, मोहम्मद उस्मान, मोहम्मद इबाद और अभय कुमार तिवारी को गिरफ्तार किया गया है।

अभय तिवारी झारखंड लोक सेवा आयोग में पांच सरकारी नौकरी की परीक्षा पास की थी। उसके अलावा उसका भाई और उसकी पत्नी भी झारखंड सरकार में नौकरी कर रहे हैं। जानकारी के मुताबिक अभय तिवारी पूर्व में टीडीपीएल कंपनी में प्रबंधक का काम संभालता था। वर्तमान में वो गोड्डा जिले के पोड़ैयाहाट में प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी के पद पर कार्यरत था।

सीआईडी के मुताबिक 10 जनवरी 2024 को जेएसएससी ने टेंडर जारी किया, जिसमें अभय तिवारी की कंपनी ने आवेदन किया। 28 जून 2024 को जेएसएससी ने टीडीपीएल के साथ जनरल एग्रीमेंट किया। इसके बाद सरकार ने परीक्षा में आइडेंटिफिकेशन का पूरा काम टीडीपीएल को सौंपने का फैसला लिया।

4 सितंबर 2024 को टीडीपीएल को परीक्षा कराने का वर्क ऑर्डर दिया गया था। लेकिन अगले ही दिन, 5 सितंबर को कंपनी ने कम रेट का हवाला देते हुए काम करने से इनकार कर दिया और तीन गुना रेट मांगा। इसके दो दिन बाद, 7 सितंबर 2026 को सरकार ने टीडीपीएल के साथ करार रद्द कर दिया और बाकी कंपनियों में से एक को परीक्षा कराने की जिम्मेदारी दी गई। परीक्षा 21 सितंबर को होनी थी। सीआईडी ने हाल में जेएसएससी के सचिव को पत्र लिखकर पूछा है कि आखिर परीक्षा का आयोजन किस कंपनी ने किया था।

अभय तिवारी के सीआईडी के सामने दिए कबूलनामे के मुताबिक, टीडीपीएल को काम दिलाने के लिए तत्कालीन जेपीएससी अध्यक्ष एल. ख्यांगते से 2 करोड़ रुपए में सौदा तय हुआ था। इसके अलावा, जेपीएससी से टीडीपीएल को मिलने वाली कुल बिलिंग का 20 प्रतिशत कमीशन एल. ख्यांगते को देने की बात तय हुई थी।  गौरतलब है कि जेपीएससी के पूर्व चेयरमैन एल ख्यांगते को सीआईडी ने गिरफ्तार कर लिया है। 

बिहार में बनी नई शिक्षा नीति 

पूरे देश में छात्रों और युवाओं के आंदोलन के बाद सरकारें सजग हो गई है। बिहार सरकार ने शिक्षा और परीक्षा के सुधार के लिए नई नीति बनाई है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए विशेष समिति बनाई जाएगी। विशेष सहयोग शिविर चलाई जाएगी और भी कई नीति बनाई गई है। 

नीति पढ़ने में तो अच्छी लग रही है। मगर हम सब किसी नीति को लागू करने में बिहार के प्रशासनिक अमले की अक्षमता से वाकिफ हैं। क्या इस नीति की बातें धरातल पर उतर पाएंगी यह देखने वाली बात होगी।

मुजफ्फरपुर की रहने वाली नेहा पटना में कंपटीशन की तैयारी करवाती है। वह बताती हैं कि,”एक तरफ सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देती है, और दूसरी तरफ जब वही बेटियां अपने हक और अधिकार के लिए सड़कों पर उतरती हैं, तो उन पर लाठियां बरसाई जाती हैं। राज्य में ऐसा माहौल बना दिया गया है जहाँ सरकारी नौकरी ही युवाओं के लिए सब कुछ बन गई है। छात्र-छात्राएं सालों-साल तैयारी करते हैं, लेकिन परीक्षा आते ही पेपर लीक हो जाता है। युवा इसी दुष्चक्र में फंसकर अपना भविष्य बर्बाद करने को मजबूर हैं।”

राज्य और देश में हो रहे छात्र आंदोलन पर वरिष्ठ पत्रकार अजय कहते हैं कि आप बेईमानी और दलाली से करोड़ों की कमाई करने वाले नेताओं की जीत को लोकतंत्र की जीत बतलाते हैं। आपको पेपर लीक भी नहीं चाहिए। सरकारी नौकरी की भर्ती परीक्षाओं में घोटाला भी नहीं चाहिए। आपको शिक्षा व्यवस्था में सुधार भी चाहिए। माफ़ कीजियेगा यह सब केवल सोशल मीडिया के रील में एक साथ हो सकते है, हकीकत की दुनिया में नहीं।

इस से इतर जिस तरह से केंद्र सरकार झुकी, और उसके बाद जिस तरह से झारखंड की सरकार को झुकना पड़ रहा है, ये बताता है कि देश की राजनीति एक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है।

(राहुल गौरव वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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